भारत में जीएम फसलों की सुरक्षा व नियम - फेडरेशन ऑफ  सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया
भारत में जीएम फसलों की सुरक्षा व नियम - डॉ बजाज 

डॉक्टर शिवेंद्र बजाज, एक्जि़क्यूटिव डायरेक्टर, फेडरेशन ऑफ  सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया

 

बढ़ती जनसंख्या को अनाज उपलब्ध कराने के लिए खेती का क्षेत्र बढ़ाए बिना कृषि की उत्पादकता बढ़ाना भारतीय किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अनिश्चित व खराब मौसम किसानों की मुश्किलें बढ़ाता है, जैसे लाभ कमाने के लिए किसानों को खेती में लगने वाला खर्च कम करना पड़ता है। फसल की पैदावार को कई चीजें प्रभावित करती हैं, इसलिए हम उत्पादकता एवं खेती का लाभ बढ़ाने के लिए पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

 

हमें अपने पर्यावरण एवं संसाधनों की रक्षा के लिए नई टेक्नॉलॉजी अपनानी होगी। कृषि बायोटेक्नॉलॉजी उन अनेक समाधानों का हिस्सा है, जो हमारे इस प्रयास के लिए आवश्यक हैं। किसी भी नई टेक्नॉलॉजी की भांति ही इस टेक्नॉलॉजी को अपनाने में भी सुरक्षा सबसे महत्वूपर्ण है।

 

   डॉक्टर शिवेंद्र बजाज, एक्जि़क्यूटिव डायरेक्टर, फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया ने बताया कि जीएम फसलें उगाना व उनका उपयोग करना सुरक्षित है। यह टेक्नॉलॉजी दुनिया की सर्वाधिक नियमाधीन टेक्नॉलॉजीज़ में से एक है। पूरी दुनिया में सरकारी नियामकों द्वारा की गई हर समीक्षा एवं आंकलन ने जीएम फसलों की सुरक्षा की पुष्टि की है। अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठन, जैसे एफएओ, डब्लूएचओ एवं ओईसीडी बायोटेक फसलों की सुरक्षा की बार बार पुष्टि कर चुके हैं और यह निष्कर्ष दे चुके हैं कि बायोटेक्नॉलॉजी द्वारा प्राप्त किया गया अनाज उतना ही सुरक्षित व पोषक है, जितना अन्य पारंपरिक एवं ऑर्गेनिक विधियों से प्राप्त अनाज होता है। हर देश इन फसलों को कमर्शियल अनुमति देने से पूर्व इनकी सुरक्षा की जाँच स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप करता है। इसलिए विभिन्न देशों में कई सालों के आंकड़े मौजूद हैं, जो इन फसलों के सुरक्षित होने की पुष्टि करते हैं। दुनिया के लोग 20 सालों से ज्यादा समय से बायोटेक फसलों के उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं और मानव स्वास्थ्य पर इनके विपरीत प्रभाव का एक भी मामला अब तक सामने नहीं आया है।

 

इसी प्रकार भारतीय नियामक व्यवस्था, जो दुनिया की सबसे कठोर नियामक व्यवस्थाओं में से एक है, उसके तहत भी कोई भी नियामक अनुमोदन देने से पूर्व डेवलपर्स को विस्तृत तौर पर अनाज, चारे एवं पर्यावरण पर उसके प्रभाव का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। भारतीय नियामक एजेंसी, जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमिटी (जीईएसी) में सभी संबंधित संगठनों के विशेषज्ञ शामिल हैं, जो इन फसलों की बायो सुरक्षा की समीक्षा करते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि सभी संबंधित सरकारी विभाग एवं मंत्रालय, जैसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण एवं वन, कृषि, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण एवं स्वतंत्र विशेषज्ञ उन विभिन्न समितियों का हिस्सा हैं, जो संपूर्ण नियामक प्रक्रिया का निर्माण करती हैं।

 

कृषि बायोटेक्नॉलॉजी शोध केंद्रित है एवं निवेश की मांग करती है। इसके जेस्टेशन की अवधि बहुत लंबी है तथा खोज के बाद इसके कमर्शियलाईज़ेशन में आठ से बारह साल का समय लगता है। भारत में इस क्षेत्र में अभी तक कुल निवेश 12,000 करोड़ रु. से अधिक है, लेकिन इस टेक्नॉलॉजी के लिए नियामक प्रक्रियाओं की अनिश्चितता के कारण निवेशकों के रिटर्न बहुत कम हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार स्पष्ट निर्णय ले कि हमें कृषि के क्षेत्र में टेक्नॉलॉजी की आवश्यकता है या नहीं। भारत में केंद्र सरकार बायोटेक्नॉलॉजी विभाग (डीबीटी) के माध्यम से कृषि बायोटेक्नॉलॉजी में सबसे बड़ी निवेशक है। डीबीटी ने पिछले पाँच सालों में बायोटेक्नॉलॉजी में लगभग 18000 करोड़ रु. का निवेश किया है। इस निवेश का अधिकांश हिस्सा कृषि बायोटेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में गया है। इस निवेश के द्वारा डीबीटी 20 से ज्यादा सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों या राज्य कृषि विश्वविद्यालयों एवं स्वायत्त संस्थानों में कृषि बायोटेक्नॉलॉजी पर 100 से ज्यादा परियोजनाओं को राशि प्रदान कर रहा है। इसके अलावा इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) ने कृषि बायोटेक्नॉलॉजी में भारी निवेश किया है। इन निवेशों के सहयोग से 25 से ज्यादा फसलें जेनेटिक रूप से संशोधित की गई हैं, जिनमें 45 से ज्यादा गुण अकेले पब्लिक सेक्टर द्वारा विकसित किए गए हैं। उदाहरण के लिए इन फसलों में बैंगन, टमाटर, चिकपी, सोर्गम आदि में कीट प्रतिरक्षा, बीमारी प्रतिरक्षा एवं एबायोटिक स्ट्रेस टॉलरेंस जैसे गुणों का विकास शामिल है।

 

यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में अनेक घरेलू कंपनियां बायोटेक्नॉलॉजी शोध में संलग्न हैं। यदि भारत में सरकार कृषि बायोटेक्नॉलॉजी को बढ़ावा देती है तथा बायोटेक्नॉलॉजी फसलों के अनुमोदन व कमर्शियलाईज़ेशन की प्रक्रिया पर स्पष्ट नीति बनाती है, तो इन घरेलू बीज कंपनियों को भारी लाभ पहुंचेगा तथा निवेश पर पर्याप्त रिटर्न मिलेगा। यह टेक्नॉलॉजी आकार के लिए उदासीन है, यानि किसान को पहुंचने वाला लाभ खेत के आकार पर निर्भर नहीं करता।

 

किसान अपने खेत की परिस्थिति, उपलब्ध संसाधन, बाजार की मांग एवं पर्यावरण के अनुरूप अपनी फसल के लिए बीज चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। असल में अनेक किसान बीज उद्योग द्वारा प्रस्तुत नए गुणों का उपयोग करने के अवसर का स्वागत करते हैं। कंपनियां जीएम एवं नॉन-जीएम फसलों की किस्में विकसित कर रही हैं, जो किसानों को उपलब्ध कराई जा रही हैं। यदि किसान के खेत में कुछ विशेष कीटों का खतरा नहीं है, तो वो जीएम बीज न बोने का निर्णय ले सकता है।

 

हमारा विश्वास है कि आधुनिक टेक्नॉलॉजी के बिना अधिकांश किसान फसल में सुधार नहीं कर पाएंगे और किसानों की आय दोगुनी करने का भारत सरकार का सपना पूरा नहीं हो सकेगा। यह भी आवश्यक है कि जहां अर्थव्यवस्था के सभी सेक्टरों, जैसे परिवहन, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्युटिकल्स आदि में शोध व विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियां बनाई जा रही हैं, तो लोगों के कल्याण के लिए कृषि सेक्टर को अलग-थलग नहीं किया जाना चाहिए। यद्यपि सरकार ने सार्वजनिक रूप से कृषि में टेक्नॉलॉजी की उपयोग किए जाने की घोषणा की है, लेकिन जमीनी सच्चाई उन घोषणाओं के विपरीत है, इसलिए इस मामले में आगे बढऩे के लिए सबसे पहले स्पष्टता की आवश्यकता है।

 

हम उन विकासशील देशों में हैं, जहां स्वयं इस टेक्नॉलॉजी का विकास करने के लिए मानव संसाधन एवं क्षमता दोनों उपलब्ध हैं। प्रतिभा व क्षमता को बर्बाद करने की बजाय, भारत उदाहरण स्थापित कर बायो टेक्नॉलॉजी में वल्र्ड लीडर बन सकता है। इससे मौजूदा सरकार द्वारा लॉन्च किए गए आत्मनिर्भर भारत अभियान में काफी योगदान मिलेगा। बायोटेक्नॉलॉजी अपनाकर भारत न केवल अनाज के आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा, अपितु विदेशी मुद्रा बचाकर अतिरिक्त विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ा सकेगा, जैसे बीटी कॉटन के मामले में हुआ था।

 


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In English.

 


Safety and Regulation of GM Crops in India-Dr Shivendra Bajaj, Executive Director, FSII




The need to increase agricultural productivity without increasing the area under cultivation to support our increasingdemand for quality food remains a challenge for the Indian farmers. The erratic and severe weather changes have also added to the farmer’s woes, such that his inputs costs have to be reduced to assure some profit. With multiple variables impacting farm yields, we cannot go back to traditional ways for increasing productivity and farm profits.


We must adopt new technologies to keep up with the challenges of safeguarding our environment and resources. Agricultural biotechnology is a part of the package of solutions that we need to use in this endeavour.  As is true of any new technology, safety plays a crucial role in adoption of the technology.


Dr.Shivendra Bajaj, Executive Director, Federation of Seed Industry of India, said,GM crops are safe to grow and consume. This technology is the one of the most regulated technology in the world. Every review and assessment by the government regulators across the world has confirmed the safety of the GM crops. Several international organizations such as the FAO, WHO and OECD have repeatedly confirmed the safety of the biotech crops and concluded that foods derived from biotechnology is as safe and nutritious as foods derived from other methods such as conventional and organic. Every country test the safety of these crops in its local condition before providing commercial approval. Therefore, there is multiple year data in multiple countries that confirm the safety of these crops. People around the world have been consuming products of biotech crops for more than 20 years and there is not even a single verified case of any concern on human health. 


Similarly, the Indian regulatory system, which is one of the most stringent regulatory system in the world, requires the developers to conduct extensive food, feed and environmental safety studies before giving any regulatory approval. The Indian regulatory agency Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) consists of experts from all relevant organizations to review the biosafety of these crops. It is to be noted that all relevant government departments and ministries such as Science and Technology, Environment and Forests, Agriculture, Health and Family Welfare and independent experts are part of various committees that form the entire regulatory process. 


Agricultural biotechnology is research intensive and demands investments. It also has a very long gestation period with a commercialisation of trait taking anywhere from eight to twelve years from the discovery phase. In India the total investment in this space is above Rs.12000 crore so far but the returns for the investors have been low because of the uncertainty regarding the regulatory process for this technology. It is paramount that the government takes clear decision, whether we need technology in the field of agriculture.In India, the Government of India through the Department of Biotechnology (DBT) is the biggest investor in agricultural biotechnology. The DBT has invested almost INR 18000 Crore in the last five years on biotechnology and a significant part of this investment has been towards the agricultural biotechnology sector. Through this investment, the DBT is funding more than 100 projects on agricultural biotechnology in more than 20 public sector institutes or State Agricultural Universities and autonomous institutes. In addition, the Indian Council for Agricultural Research (ICAR) has also made significant investment in agricultural biotechnology. With the support of these investments, more than 25 crops have been genetically improved with over 45 traits by the public sector alone. Few examples of crops include brinjal, tomato, chickpea, sorghum, groundnut in traits like insect resistance, disease resistance and abiotic stress tolerance. 


It is also to be highlighted that in India quite a many domestic companies are engaged in the biotechnology research. These domestic seed companies will benefit tremendously if the Government promotes agricultural biotechnology in India and makes clear policy on the approval process and commercialization of biotechnology crops which also rewards adequate return on the investment. The technology is size neutral which means the benefits to the farmers is not dependent on the size of farmland. 


Farmers are free to choose the seeds for planting their crops based on their farms conditions, available resources, market demand and environment. In fact, many farmers welcome the opportunity to use new traits that are offered by the seed industry. Companies continue to develop both GM and non-GM crop varieties that are made available to farmers. A farmer may choose not to plant GM seeds if certain destructive insects are not a problem on his farm.  


It is our firm belief that without introduction of modern technology the lot of the farmers cannot be improved and the government’s goals of doubling farmer income cannot be achieved. It is also important to note that while all sectors of economy like transportation, telecommunication, Information technology, pharmaceuticals, etc are recipients of policies that encourage research & development, innovation for people welfare, agriculture should not be excluded from the same. Though the government has publicly announced about technology in agriculture, the ground realities are contrary to such announcements and hence clarity on the same is the first requirement to take this subject forward. 


We are one of very few developing nations that has the human resource and capability to develop this technology on our own. Instead of losing this talent and capability, India can set the example and become the world leader in biotechnology. It will significantly contribute to the AtmaNirbharta campaign launched by the current government. With the adoption of biotechnology, India can not only reduce food imports thereby saving precious foreign exchange but also the have surplus as demonstrated in case of Bt cotton.